Montague Chelmsford Reforms 1919 and Govt of India Act 1935 in Hindi

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Montague Chelmsford Reforms

इससे पहले की हम Montague Chelmsford Reforms 1919  एवं Govt of India Act 1935 के प्रावधानों के बारे में पढ़ें, द्वैत शासन पद्धति को समझें जिससे आगे के प्रावधान आसानी से समझ आए। द्वैत शासन पद्धति एक आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन व्यवस्था थी जिसे British author लियोनेल कर्टिस (Lionel Curtis) ने प्रतिपादित किया था। इस पद्धति के अनुसार शासन व्यवस्था को 2 विषयों, आरक्षित एवं हस्तांतरित विषय में बाँट दिया गया, आरक्षित विषय गवर्नर जनरल के लिए सुरक्षित रखे गए थे जबकि हस्तांतरित विषय भारतीय मत्रियों को दिए गए थे। याद रखें आरक्षित विषयों को गवर्नर जनरल की Executive Council के सदस्यों के लिए सुरक्षित रखा गया था। ये सदस्य गवर्नर जनरल द्वारा ही मनोनीत होते थे और उन्हीं के लिए उत्तरदायी होते थे।

Dwait Shasan

द्वैत शासन सर्वप्रथम 1919 के Act में प्रान्तों में लागू किया गया जबकि केंद्र को द्वि-सदनात्मक विधायिका (राज्य परिषद + केन्द्रीय विधान परिषद) बना दिया गया, इसके विपरीत 1935 के Act में केंद्र में द्वैत शासन व्यवस्था प्रारम्भ किया गया जबकि प्रान्त में द्वि-सदनात्मक विधायिका की व्यवस्था की गयी।

भारत शासन अधिनियम 1919 (Montague Chelmsford reforms)

1919 के Act के समय तात्कालीन भारत सचिव Edwin Samuel Montagu एवं Lord Chelmsford वायसराय थे इन्होने ब्रिटिश कैबिनेट में भारत में सामाजिक सुधारों के लिए वकालत की थी, इन्ही के नाम पर इस अधिनियम को Montague Chelmsford reforms या सुधार अधिनियम भी कहा जाता है। भारत सचिव नियुक्त होने के कुछ समय पश्चात् ही मांटेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को कॉमन सभा में ब्रिटिश सरकार के उद्देश्य पर एक महत्वपूर्ण घोषणा की जिसमे उन्होंने भारत में स्वशासी संस्थाओं के विकास एवं सामाजिक सुधारों पर प्रकाश डाला। इस कारण इस Act को अगस्त सुधार आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है।

भारत सरकार अधिनियम- 1935

1935 का भारत शासन अधिनियम थोड़ा लम्बा एवं जटिल था। इसे 3 जुलाई 1936 को आंशिक रूप से लागू किया गया जिसके बाद भारत में पहली बार आम चुनाव संपन्न हुए उसके बाद अप्रैल, 1937 में इस Act को पूर्णरूप से लागू किया गया। पूर्व में अंग्रेजों द्वारा लाये गये सभी अधिनियमों की तरह यह अधिनियम भी भारतीयों को संतुष्ट करने में असफल रहा क्योंकि इस अधिनियम में भी अनेकों दोष थे, नेहरू जी ने इसे ‘दासता का नया चार्टर’ कहा तो वही राजगोपालाचारी ने इसे द्वैध शासन पद्धति से भी बुरा एवं बिल्कुल अस्वीकृत कहा।

भारत शासन अधिनियम 1919 एवं 1935 का तुलनात्मक अध्ययन

भारत शासन अधिनियम 1919

भारत शासन अधिनियम 1935

प्रान्तों में द्वैत शासन व्यवस्था शुरू की गयी।केंद्र में द्वैत शासन व्यवस्था शुरू की गयी।
केंद्र में द्वि-सदनात्मक व्यवस्था शुरू की गई (राज्य परिषद+केन्द्रीय विधान परिषद)राज्यों में द्वि-सदनात्मक व्यवस्था शुरू की गई।
प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की गई जिसमे भारतीय जनता को मताधिकार दिया गया।प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था को जारी रखा गया।
महिलाओं को मताधिकार दिया गया।महिलाओं के मताधिकार को जारी रखा गया।
प्रशासन के विषयों को केंद्र व राज्य सूची में बांटा गया।प्रशासन के विषयों को केन्द्रीय, प्रांतीय एवं समवर्ती सूची में बांटा गया।
सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार करके सिक्खों को निर्वाचन में शामिल किया गया।सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार करके यूरोपीय, एंग्लो इंडियन व इसाई को सम्मिलित किया गया।
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में 3 भारतीय सदस्यों की नियुक्ति की गई ।बर्मा को भारत संघ से अलग किया गया।
  • लोक सेवा आयोग (PSC) का गठन किया गया।
  • RBI (रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया) व संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का गठन 1935 में किया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय/Supreme Court का गठन 1935 में किया गया।

स्मरणीय तथ्य-

  • ध्यान रखें 1936 में भारत में पहला आम चुनाव सपन्न हुआ।
  • भारतीय संविधान का अधिकांश अंश 1935 के भारत शासन अधिनियम से ही लिया गया है।

1935 का भारत शासन अधिनियम अंग्रेजी शासन व्यवस्था द्वारा लाया गया अंतिम Act था, यदि आपने सभी Act एवं उनके प्रावधानों को Detail में पढ़ लिया है तो एक बार फिर से समय है उस Infgraphic पर नजर डालने का जिसे हमने इन Act को पढने से पहले देखा था। Infgraphic देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

आने वाले Chapter में हम संविधान की प्रमुख मांगे व सिफारिशें के बारे में पढेंगे यदि आप इस Act से पहले लाये गये Act के बारे में नहीं पढ़ा है तो नीचे दिए लिंक में क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

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